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मेरे अल्फाज़

कुछ शब्दों सा मैं

jitender kumar

6 कविताएं

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यही वह जगह है
जहाँ आकर मैं बिखर जाता हूँ
शब्दों में,
पुस्तकालय में रखी
उन धूल लगी किताबों के बीच
और जब वो यूं अचानक खोली जाती है तो
मैं एक-एक करके बिखर
पड़ता हूँ,
और तब मेरा महत्व और भी बढ़ जाता है।
क्योंकि लोग फिर मुझे समेटने की
मशक्कत करते हैं।
और मैं तब अपनी आनन्दित अवस्था के
चर्म पर होता हूँ,
क्योंकि वहीं मैं
शब्द से पद और
पद से वाक्य और
वाक्य से मेरा रूप जी हां
'कविता'
यही वह जगह है जहां
मेरा स्थान और ऊंचा हो जाता है।
क्रोध और कोमलता में भी,

- जितेन्द्र कुमार

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