अध्यात्म काव्य

                
                                                             
                            सूरज किरणों से अधिक हैं ईश्वर के हाथ
                                                                     
                            
भक्तों के परित्राण हित प्रकटें दीनानाथ
मरु सिक्ता कण से अधिक, प्रभु के अगनित पाद
शरणागत वत्सल प्रभु, गिनें नहीं अपराध
सकल रूप प्रभु रूप हैं, सकल नाम प्रभु नाम
नाम रूप गुण से परे, वही चैतन्य अनाम
स्याही में सब लिपियों, रंगों में सब चित्र
विद्यमान हैं स्वर्ण में, गहने विविध विचित्र
रंगों में दृश्यावली, विविध भांति चित्रित
पत्थर में सब मूर्तियां, वैसे ही सन्निहित
वाणी भाषा हैं विविध, व्यापक प्रभु के कान
भक्ति भाव से जो कहे, सुने सदा भगवान


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1 year ago

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