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मेरे अल्फाज़

बलात्कार और कब तक...

Jagrati Gupta

2 कविताएं

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नोच लिया है जिस्म को मेरे तो सुन लो।
मन मेरा फिर भी पाक साफ रहेगा।
मन को मैला कर न सके तुम, हां तन पे मगर एक दाग रहेगा॥

धब्बा तुमने ना मुझपे लगाया
लगा वो इस समाज पे है।
मैं सिसकूं हुजरे के भीतर, दोषी फलक-ए-ताज पे है॥

कैसा तुम्हारा न्याय, कैसा यह देश है।
पहना यहां हर किसी ने, एक नया भेष है॥

काम गन्दा उसने किया, और गन्दी मैं कहलाई।
वाह रे खुदा तेरा जहां, वाह रे तेरी खुदाई॥

कब तक शर्म का चोला तन पे, सिर्फ हमको ही रखना होगा।
कब तक दरिन्दों की दरिन्दगी का जहर हमको ही चखना होगा॥

कब तक याद करूं मैं उस अल्लाह को भगवान को।
क्या कुछ भी फर्ज नहीं है, उसके बनाए इंसान को॥

कब तक मेरा हर पल हर क्षण, एैसे ही शिकार होगा।
घर के भीतर, घर के बाहर यूं ही मेरा 'बलात्कार' होगा॥

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