मेरी अधूरी कविता

                                22-23 जून की रात थी
दो अजनबियों की बात थी
समाज की नजरों में
वो पति-पत्नी थे क्योंकि
चार दिन पूर्व जो उनकी
रीति रिवाजों से शादी हुई थी
वो आमने-सामने पहली मुलाकात थी
वो सकुचायी शर्माये जा रही थी
नहीं कुछ भी बोल पा रही थी
दूसरे की हालत भी इसलिए खराब थी
कैसे एक अजनबी लडकी को स्पर्श करें
कैसे उससे अपने मन की एक एक बात करें
पहली बार कोई लड़की जो इतने पास थी
फिर अचानक जैसे शब्दों में उबाल आया
उड़ेल दी वे सब बातें जिनका उफान आया
मैंने तुम्हें अपनी सहधर्मिणी स्वीकार किया
यदि तुम भी मुझे उसी रूप में स्वीकार करो
यदि पसन्द नहीं कोई बात मेरी
यदि पसन्द नहीं मुंह की आकृति मेरी
तुम स्वछन्द हो लेने को फैसला कोई
तब तक छूउंगा नहीं तुम्हें जब तक
न स्वीकार हो तुम्हें आदत ओ बात मेरी
रंग रूप न मैंने देखा है न सलाह दूंगा तुम्हें ऐसी
मैंने उस परम शक्ति पर रखा विश्वास
और उसी से ही लगायी थी ऐसी आस
नहीं चाहिए रूप सुन्दरी, नहीं चाहिए धन-माल
ऐसा साथी दीजिए प्रभु करें प्यार और विश्वास
वो धीरे से बोली सकुचाती
मात-पिता ईश्वर सम है
कैसे करूं उन पर अविश्वास
सोच समझ कर ही लिया होगा फैसला
जो भेज दिया मुझे तुम्हारे पास
प्रभु ने भी मुझपर किया बहुत उपकार
फिर मीठी-मीठी बातें कर उसने
दे दिया मुझे छूने का अधिकार
मैंने भी प्रभु को धन्य कहा
प्रत्युत्तर में प्राण प्रिये को दिया
हमेशा बराबरी का अधिकार
लेकिन ये क्या सुबह होते ही
जैसे ही बिस्तर से उठी, झुक गयी
पैरों को स्पर्श किया
मैं जडवत् स्तब्ध, ये तुमने क्या किया
जैसे मुझे स्वामी मान दासी अपने को मान लिया
आभास होते ही मुझे ओ आंखें भर गयी मेरी
कंधे पकड़ ऊपर उठा छाती से लगा लिया
कभी नहीं मन में फिर ऐसा कोई भाव आने देना
दासी नहीं हो तुम मेरी, प्राण प्रिये मैंने मान लिया
अब, ऐसा एक तुम्हें वचन देना है
प्रभु छोड़ समक्ष किसी के नहीं झुकना है
ओ मेरी प्राणेश्वरी, बात तुमने ली सारी मान
सभी वचन अपने निभा दिया बहुत ही मान
दिया बहुत ही मान जीवन भर ली थी यह ठान
झंझावत भी आये मगर, मुझे करा गयी ये भान
उस सती स्त्री ने जीवनभर किये बहुत एहसान

- जगदीश प्रसाद शर्मा

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5 days ago
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