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मेरे अल्फाज़

स्पन्दन

संतोष सिंह

36 कविताएं

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अस्त व्यस्त होकर पहुंची, कृषक के पांव से।
मिलन को अधीर हवायें, गेहूं के गांव से।।

गई बीत संध्या रजनी, निडर ठांव में।
ठिठकी श्रान्त पछुआ, पीपल की छांव में।।

तीसी की रूनझुन ने, मचाई है खलबली।
खन-खन निनाद से, बिहसि है गली- गली।।

अमिया की गंध हो, या कली अधखुली।
स्निग्ध विधुलेखा, ऊषा-अंशु बिछी मखमली।।

कुपित दुपहरी है गम्भीर, ताप डाये कृषकों पर।
मनहर अमर्त्य प्रतिबिंब को, जलाये जी भरकर।।

स्वेदन की बुंद-बुंद से, किया उक्षित चमन।
फसलों के विहाग से, खेत-कृषक है मगन।।

खुले हैं द्वार जबसे, गुलमोहर की कोपलों में।
हैं व्यग्र माधव, सखा बनने को हर पलों में।।

होगी धरती पुत्र की जीत, ठुमके लगाये घरों में।
उफनाये अधरों पर नवगीत, भरके प्रीत बादलों में।।

छविजाल बुनने, सघन स्याम अलकों के वितान में।
चुपके चला है चुमने, बसन्त कमलिनी को उद्यान में।।

खग विहग नयन स्पन्दित, उलझी खुशी में आली।
प्रियतम संग भ्रमरी ठुमक ठुमक लजाये दे ताली।।


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