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मेरे अल्फाज़

ता-उम्र ही रहें जो हम नाकाम क्या करें

Iqbal mehdi

121 कविताएं

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ता-उम्र ही रहें जो हम नाकाम क्या करें ।
जलते रहें शमां से हर एक शाम क्या करें ।।

आएगा ना जवाब ये मालूम था मग़र ।
भेजें है हमनें रोज़ ही पैगाम क्या करें ।।

लिखा ही नहीं था जब मुक़द्दर में आसमां ।
इस वास्ते रहे है हम -गुमनाम क्या करें ।।

रुसवाईयां ज़माने की सर अपने ओढ़ ली ।
बदनाम किसी और का अब नाम क्या करें ।।

जब तक रहे ज़मी पे ना हम पूरी कर सकें ।
अब अपनी हसरतों का हम अंजाम क्या करें ।।

पल पल तेरी तलाश, और हर पल तेरा ख़्याल।
अपना फक्त यहीं तो है बस काम क्या करें ।।

'मेंहदी' बड़े सुकूं से जब सोना है क़ब्र में ।
जीते जी फ़िर इस दहर में आराम क्या करें ।।

इक़बाल मेंहदी काज़मी

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