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मेरे अल्फाज़

मैं तूझको पा न सका हूँ ये लाचारी है मेरी । पर लफ्ज़ों में बसाया है ये फ़नकारी है मेरी

Iqbal mehdi

121 कविताएं

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मैं तूझको पा न सका हूँ ये लाचारी है मेरी ।
पर लफ्ज़ों में बसाया है ये फ़नकारी है मेरी ।
एक रोज़ जलाया था,तेरे नाम का दीपक ।
अब तक इन हवाओं से जंग जारी है मेरी।।


इक़बाल मेंहदी काज़मी 


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