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मेरे अल्फाज़

मैं पीता नहीं हूं पर जाम आ रहा है

Iqbal mehdi

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मेरे लिये सारा ये ताम आ रहा है ।
मैं पीता नही हूं पर जाम आ रहा है।।

जो बचपन में माँ ने वफ़ा है पिलाई ।
वहीं तो हमारे अब काम आ रहा है ।

मैं जो ये बयान-ऐ-सुखन कर रहा हूँ ।
फरिश्तों का मुझकों सलाम आ रहा है ।।

जो महफ़िल में आकर है पर्दे में बैठें ।
ज़ुबाँ पर उन्हीं का तो नाम आ रहा है ।

अमानत हूँ उनकी मैं बिकता नही हूँ ।
तू क्यूं लेके जेबों में दाम आ रहा है ।।

यहाँ घर ख़ुदा का ,अजां हो रही है ।
मेरे रुकने का ये मकाम आ रहा है ।।

संभालो दिलो को अब महफ़िल में लोगों।
"मेंहदी"लेके अपना कलाम आ रहा है ।।

इक़बाल मेंहदी काज़मी


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