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मेरे अल्फाज़

इतना शदीद गम है मगर आंख नम नहीं

Iqbal mehdi

121 कविताएं

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इतना शदीद गम है मगर आंख नम नहीं ।
कैसे लिखूं कि मुझ पे तुम्हारा करम नहीं ।।

तन्हा नहीं हूं मैं कि ख़ुदा मेरे साथ है ।
पक्का यकीन है कि ये मेरा भरम नहीं ।।

बढ़ते ही जा रहे है सितमगार के सितम ।
हूं मुब्तिला मैं सब्र में ये भी तो कम नहीं ।।

सजदे में सर है उनका मगर हक़ से दूर है ।
माले हराम खाने में उनको शरम नहीं ।।

बढ़ते हुए रकीबों की तादाद देख कर ।
अपनी शिकस्त मान लें मेंहदी'वो हम नहीं ।।

- इक़बाल मेंहदी काजमी
533, गोविन्द बाग़ निकट पानी टंकी
बलरामपुर

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