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मेरे अल्फाज़

मेरा बयान सुन लो कि मैं ही शराब हूँ

Iqbal mehdi

121 कविताएं

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क्यूं मुझको बोलते हो बहुत ही ख़राब हूँ ।
मेरा बयान सुन लो कि, मैं ही शराब हूँ ।।

रुसवाइयां हो मेरी अग़र लड़खड़ाओ तुम ।
औऱ मेरे नाम से ही शराबी कहलाओ तुम।
इंसाफ है क्या कोई ज़रा ये बताओ तुम ।
तेरी हर एक ख़ता का क्या मैं जवाब हूँ ।
मेरा बयान सुन लो कि मैं ही शराब हूँ ।।

दुनिया गवाह है कि ,ख़तावार नही हूँ।
बोतल में कैद हूँ पर गुनहगार नहीं हूँ ।।
मैं तो किसी के लब का तलबगार नहीं हूँ
शीशे के अंदर बन्द मैं चढ़ता शबाब हूँ ।
मेरा बयान सुन लो कि मैं ही शराब हूँ ।।

जो चाहे आज़माए मैं होती खफ़ा नहीं ।
मेरा कमाल क्या है ये किसको पता नहीं ।
ख़ून-ऐ-ज़िगर जलाए तो मेरी ख़ता नहीं ।।
सब खूब जानते है बहुत कड़वा आब हूँ ।
मेरा बयान सुन लो कि मैं ही शराब हूँ ।।

मुझकों गले लगाने का तुझ पर सुरूर था ।
आता था मेरे पास तू कब मुझसे दूर था ।
जो मौत तक तू आया क्या मेरा क़ुसूर था
ख़ुद तेरा ही किया हुआ मैं इंतिख़ाब हूँ ।
मेरा बयान सुन लो कि मैं ही शराब हूँ ।।

कोई ख़ता नहीं थी मग़र रात दिन जली ।
होती रही बदनाम मैं यूँ ही गली-गली ।
ग़ालिब के लब लगीं तो,अशआर में ढली।।
सब ने जिसे पढ़ा है मैं वो -क़िताब हूँ ।।
मेरा बयान सुन लो कि मैं ही शराब हूँ ।।

जिसके क़रीब जाने से पहले ही रुकी हूँ ।
उस हौसले के आगे हमेशा मैं झुकी हूँ।
"मेंहदी"के लब को आजतक मैं छू न सकी हूँ।
ग़ैरत भरी है उसमें और मैं बे-हिज़ाब हूँ ।
मेरा बयान सुन लो कि मैं ही शराब हूँ ।।


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