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मेरे अल्फाज़

बिखर के टूट गया, ख़्वाब जो सुनहरा था

Iqbal mehdi

119 कविताएं

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बिखर के टूट गया, ख़्वाब जो सुनहरा था 
मेरी तन्हाई पर, रुसवाईयों का पहरा था ।।
बेबसी उनकी थी आख़िर इलाज़ क्या करते 
दिल निकालना पड़ा ,ज़ख्म इतना गहरा था।।

- इक़बाल मेंहदी काज़मी

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