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मेरे अल्फाज़

पलटी तूने नक़ाब तो मुझकों गुमां हुआ ।

Iqbal mehdi

75 कविताएं

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पलटी तूने नक़ाब तो मुझकों गुमां हुआ।
जैसे कि चाँद बादल से जलवानुमा हुआ।।

तेरी चमक के सामने पलकें ना उठ सकीं।
दीदार की चाहत थी, पर वो ही ना हुआ।।

रुख़ पर निग़ाह कर-के हो लेते शादमान।
ऐसा करम ये आपका हम-पर कहाँ हुआ।।

आहट को पाकर तेरी धड़क जाते हैं पत्थर।
सारे जहाँ में एक- क्या तू ही जवां हुआ।।

हर-एक क़दम वो ही बढ़ाता गया उल्फ़त।
जो कुछ,आज-तक हमारे दरमियाँ हुआ।।

अब आकर तुम ही मेरी महफ़िल सजाओगे।
वो पालने-वाला जो अग़र मेहरबां हुआ।।

"मेंहदी"की क़सम अपने ही दिल मे इसे रखना।
मेरी क़लम से आप-पर जो कुछ बयां हुआ।।

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