आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हम जागे-जागे रहते हैंं

hum jaage-jage rahte hain,sari duniya so jati hai
                
                                                                                 
                            घनघोर अँधेरी रातों में,नीदों की बगावत होती है
                                                                                                

हम जागे-जागे रहते हैं,जब सारी दुनिया सोती है ।।
सूनी-सूनी इन रातों में,हम तन्हा-तन्हा होते हैं
दुनिया सुकून से सोती है,हम चुपके-चुपके रोते हैं।।
उफ़!कैसा दर्द जगा दिल में,रह-रह कर हम तड़प रहे,
कोई भी हमदर्द नही,फिर किससे अपना दर्द कहें।।
लगता है ताउम्र हमें,यूँ घुट-घुट कर ही जीना है,
रातों को यूँ उठ-उठ कर,अपने इस गम को पीना है।।
बिखरी-बिखरी ख्वाहिश मेरी,सपने भी हैं डरे-डरे
मौत न जाने कब आए,हम पहले ही सौ बार मरे।।
जब तूफ़ान दर्द का आता है,रातें दुश्मन बन जाती,
फिर पास हमारे आने में,सारी दुनिया घबराती है।।
साँसे बोझिल होती हैं,फिर याद तुम्हारी आती है
हम जागे-जागे रहते हैं,सारी दुनिया सो जाती है।।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 months ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X