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मेरे अल्फाज़

पासबाँ

Harvinder Pal

51 कविताएं

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सुकूने साऐ कहीं पासबाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता

पशेमाँ हो के चले आए सर झुकाऐ हुऐ
गर्दने ख़म तो कभी आस्ताँ नहीं मिलता

कैफे खुदा रहा शिकवा बस मेरा
कहीं गुलशन तो कहीं बागबाँ नहीं मिलता

हाले दिल उनको सुनाना मयस्सर ना हुआ
दिल की दौलत है दर्द मेरा कभी ज़ुबाँ नहीं मिलता।

सुकूने साऐ/ राहत भरी छाँव
पासबाँ/ रखवाला(माँ के आँचल की छाँव का अहसास)
पशेमाँ/शर्मिन्दा होकर
गर्दने ख़म/गर्दन का झुकाव
आस्ताँ/ दर/चौखट
बागबाँ/ माली

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