गांधी की अहिंसा

                
                                                             
                            स्वतंत्रता की चिंगारी को थी ज़रूरत आंधी को,
                                                                     
                            
तो भेज दिया ईश्वर ने अपने रूप मे गाँधी को|

नरम स्वाभाव दृढ़ संकल्पों से जीत लिया जिसने हृदय आफ्रीका का;
वह सच्चा देश भक्त सपूत था,वीरों की धरती भारत माता का|

धर्म कर्म ही पूजा थी जिसकी,गीता को पढ़ने वाला था,
सभी धर्म को समान मानता,सबको एकजुट करने वाला था|

स्वतंत्रता के प्यासे थे पर हिंसा रास न आती थी,
खादी कपड़ा सादा भोजन उनकी यही सादगी थी|

हर एक दिन उनके लिए एक पर्व था,
उनको अपने देश पर अत्यधिक गर्व था|

बड़ी स्थिरता से चिंगारी को आग बनाया,
स्वराज के राह पर अहिंसा को अपनाया|

चल दिए स्वन्रंता के मार्ग पर जो एक बार,
रुके ना एक बार उनके पग न बार बार|

आग थी बदल चुकी घने जंगलों के लपटों में,
स्वतंत्रता पाने को मच गई थी ज़िद अपनों में |

उमड़ चुका था सैलाब जन समूह का ,
थक गये थे लोग अंग्रेज़ों के कुकर्मों से ,
आज़ाद ,भगत,बिस्मिल्ला राजगुरु सब;
जो कुर्बान हुए थे देश की शान के लिए |

हज़ारों हो गये कुर्बान देश के लिए,
मैं लिखता रहूँगा इनके मान के लिए,
मैं लिखता रहूँगा इनके सम्मान के लिए |


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8 months ago
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