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मेरे अल्फाज़

वक़्त

Harish Mamgain

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वक़्त

क्या करें सुनने बैठे हैं, कोई कुछ सुनाता नहीं
पलकें बिछाए हुए हैं , दर के अंदर आता नहीं
सिल लेना दोस्तों अपनी अपनी बातूनी ज़बानें
दिल भर आता है , क्यूँ कोई दिल लगाता नहीं
कुछ आँखों में , कुछ हॄदय में, काँटे ही काँटे हैं
चमन बिगड़ गया, प्यार के फूल खिलाता नहीं
दरया भी रवानी में है , किश्तियाँ भी मतवाली
नाख़ुदा मौन है , उसको कुछ रास आता नहीं
संभल के देना दिल दोस्तों , दिलबर क्या कहें
दिल के टुकड़े टुकड़े करने में भी घबराता नहीं
बस मीठे लबरेज़ बोल पसंद हैं मेरे महबूब को
दो बोल सुन कड़वे, मिलने को फिर आता नहीं
अपनी अपनी अना की तस्कीन में मुब्तिला हैं
अजीब शहर है , कोई किसी के मन भाता नहीं
वो लोग और थे , लड़ कर भी हाथ मिलाते थे
आज जो रूठ जाता है फिर वापस आता नहीं

© हरीश ममगाई


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