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मेरे अल्फाज़

हार रहा हूँ खुद से

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हार रहा हूँ खुद से, क्या उम्मीद ज्यादा पाल रखी थी।
चाय हुई है कड़वी, क्या पत्ती ज्यादा डाल रखी थीं।

जिंदगी हो या चाय, मात्रा सही होना तो ज़रूरी है।
आदतें हुईं बेकाबू, क्या इनकी ज्यादा चाल रखी थी।

बेटा था बाप हुआ, ये बदलाव समझ आया नहीं।
साख बचाने को, क्या आंख ज्यादा लाल रखी थी।

बदलाव का ये क्रम, कहीं कुछ टूटा सा लगता है।
पापा ने बातों में, क्या मिश्री ज्यादा घाल रखी थी।

वो दोस्त रहे मेरे, मैं क्यूँ बस बाप ही बनता हूँ।
मेरी तकलीफों को, क्या उन्होंने ज्यादा साल रखी थी।

- रजनीश "स्वछंद"


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