आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   main bhagat singh mera parichay

मेरे अल्फाज़

मैं भगत सिंह मेरा परिचय

Guddu Sikandrabadi

125 कविताएं

75 Views
मेरी जिंदगी शुरू होती है
मेरी पैतृक ज़मीं मेरे गांव से ,
खटकड़ कलां पंजाब का
माँ-विद्यावती और
पिता किशन सिंह के नाम से ,
जन्म मेरा जिला लायलपुर के बंगा में
मैं जन्मा हूँ सिख भगत सिंह के नाम से ।

अन्याय के खिलाफ हमेशा रहा
मैं प्रभावित हूँ जलियांवाले हत्या काण्ड से ,
बाल मन रहा मेरा इस छाप पर
लाशें ही लाशें बिछी थी उस
जलियांवाले बाग में ।

बच्चों-बूढों, महिलायें व
नौजवानों की हत्या थी
बैसाखी के दिन की घटना थी ,
गोलियां चल रही थीं
इंसाँ मर रहा था
जनरल डायर की आवाज पे ।

स्वतंत्र भारत की मैंने ठानी
क्रांतिकारी आवाज से
जनरल डायर मारा जाए
मेरे इन्हीं हाथ से ,

साइमन कमीशन के विरोध हुए
लाजपत जी को मारा-पीटा गया
अंदर तक मैं हिल चुका था
मैं बदला लेने की आग में ।

मैं क्रांतिकारी उठ चला
साइमन गोली से मारा गया
चंद्रशेखर , राजगुरु , सुखदेव
और बटुकेश्वर के साथ से ,

हमें तो हिंसा छुपानी थी
इंक़लाब-जिंदाबाद निशानी थी
क्रांति तो लानी थी
लाहौर कोर्ट में मौका मिला
साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद से ।

कोर्ट में बम गिराना मकसद नहीं
आंखें सब की खुलवानी थी
पर्चे उड़ा दिये विरोध पर
हुए गिरफ्तार हम भी
यही हमारी कुर्बानी थी ,

आजीवन कारावास बटुकेश्वर ले गए
फांसी तो हमने पानी थी
अहिंसा का मार्ग अपनाकर
गांधी गिरी नहीं दिखानी थी ,

आजादी की नींव डाल दी
इंक़लाब-जिंदाबाद से
पर आजादी अभी बाकी थी
अंग्रेजी साम्राज्यवाद से ।

तय समय से पहले ही
फांसी हमको लगा दी गई
सुखदेव , राजगुरु और मैं
हमारी जिंदगी बुझा दी गई ,

हँसते-हँसते जान दे दी
क्या फर्क पड़ता है किसी को
शहीद होने का वक़्त मिला
एक दिन पहले मिले या बाद से ।

कलम की ताकत दिखाई
मैंने अहिंसा की दौड़ में
खामोशी दिखा दी जाती थी
मेरी स्याह को गांधी जी के दौर में ,

खून खौल उठेगा तुम्हारा भी
अत्याचार सहे जब कोई तुम्हारा भी
बदले की भावना को जन्म देती
अन्याय को देखकर आंखों से ।

मैं क्रांतिकारी बना
मेरा नया तरीका था
ग्रुप बनाकर चलना
हिंसा का खौफ खिलौना था ,

मैं भगत सिंह क्रांतिकारी
मैं सत्य की राह का पैमाना था
लुट जाना था देश मेरा
हुकूमत से देश बचाना था ।

आज फिर लिख रहे है नौजवाँ
क्रांति अहिंसा विचारों से
फिर दब जाएगी स्याह तुम्हारी
सियासत की दीवारों में ,

सत्य , न्याय कभी छुपने न देना
मेरे उम्मीद भरे विचारों से
लूट न पाए भारत देश हमारा
क्रांति लाकर देखा दो इंकलाबी नारों से ।

अहिंसा न चले
हिंसा का खौफ दिखाना
बच न पाए कोई भी दोषी
निर्दोषों की जान बचाना ,

मेरी इतनी सी कहानी थी
कुर्बान मेरी जवानी थी
ये दिन ये रातें सोच में गुजरी
न्याय पर होते अत्याचारों से ।

मुझे प्रेम था मेरी मिट्टी से
मेरे देश मेरे वतन की चिट्ठी से
मैंने भी लिखा था एक नारा
जन-जन की मुठ्ठी में ,

आज ही लिख लो मेरा नारा
मेरे ही क्रांति नाम से
इंक़लाब जिंदाबाद-
साम्राज्यवाद मुर्दाबाद ,

मै जन्मा हूँ सिख भगत सिंह के नाम से ...

- गुड्डू सिकंद्राबादी

 हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!