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मेरे अल्फाज़

हिचकी

Govind Dangi

1 कविता

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हिचकी जो आऐ, तो समझना वही जो समझा जाता है, कि मैने याद किया।
बदले मे तुम भी संप्रेषित करना अपनी भावनाऐं, अनुभूती हो मुझे जिनकी....
कब से बैठा हूं आस लगाऐ, काश कभी हिचकी मुझे भी आऐ।

जो ना आऐ हिचकी, तो समझ लेना नेटवर्क मे कंजेशन है,
समझ लेना कि, मेरे मन के सिग्नलों को, लेंड नहीं करने दे रहा, तुम्हारे मन का रिसीवर।

और गर आऐ हिचकी किंतु मानने मे गुरेज़ हो,
तो कहना नहीं आती हिचकी, नेटवर्क खराब है,
मैैैं समझ जाऊंगा कि मेरा भाग्य खराब है।
मैैैं यह भी समझ जाऊंगा की नेटवर्क स्वस्थ हैं
किंतु जिस उपभोक्ता को मैैैं काल करना चाहता हूं,
वह किसी अन्य काल में व्यस्त हैं।

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