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मेरे अल्फाज़

वक्त वो किधर गया

Gopi Nath

5 कविताएं

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दो आंसू छोड़ आँखों में
गोद से वो उतर गया

रह गए खड़े हम धूप में
वो छाँव सा गुजर गया

ये जमी वही, आसमां भी वही
न जाने मगर वक्त वो किधर गया

स्वपन वो जिए कहाँ
जलके जो ख़ाक हो गए

वक्त की शाख पर
बनके राख वो सो गए

शब्द-शब्द घुल गया
आंसुओं में मिल गया

खुद को लिखा था कभी
खत वो किधर गया

होंसले वो जिए कहाँ
जवां हुए और मर गए

ओस की बूंदों से थे
आंच मिली तो पिघल गए

उम्र सी झड़ गई
पत्तियां वो बिखर गई

हरा-भरा था कभी
दरख्त वो किधर गया

जख्म वो सिये कहाँ
फुरसतों में हरे हो गए

जो गिरे आँसू पिघल-पिघल
और भी गहरे हो गए

वो लाल था जम गया
सफ़ेद सा क्यों रंग गया

रगों में था बहता कभी
रक्त वो किधर गया

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