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मेरे अल्फाज़

छाता भीगा अलमारी में पसीने से

Girish Mehra

14 कविताएं

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ऐ वर्षा
अब क्यों रूठी रहती है
कभी, कभी बरसती है
बचपन से साथ था तुझ से
तू खुशिया थी
तू छुट्टियां थी
तुझ संग खेलने की
हर मन में चाह थी

ऐ वर्षा
तू कागज़ की नाव थी
भीग कर कैसे चलती थी
एक तू ही तो थी जो
बिन भेद भाव बरसती थी
तुझे मालूम तो है ये सब
तेरी हर बूंद गवाह थी

ऐ वर्षा
बता तो सही
तू क्यों रूठी है
पेड़ो से, धरती से, नव अंकुर से
कैसे स्वागत करते थे तेरा
तुझे याद है ??
या तू भूल गयी....

ऐ वर्षा
बता तो सही
बचपन के वो फूल भी
तेरी राह देखते है
तू कब बरसेगी
आपस में बाते करते है

ऐ वर्षा
वो गीला छाता
नहीं खुलता अब बरामदे में
वो भीगी चिड़िया भी अब
नहीं झटकती पंख चौखट में

ऐ वर्षा
तू मुझ से क्यों खफा है
एक बार बरस बतला तो सही
क्या गलती है मेरी’ या अब तू
मेरे बचपन की दोस्त नहीं

ऐ वर्षा बता तो सही
क्यों रूठी रहती है
क्या तेरा भी पानी सूख गया?
या जहां तू रहती है
वहां भी अब पेड़ नहीं
ऐ वर्षा बता तो सही…..

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