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ae khuda gar tu sab dekhta hai

मेरे अल्फाज़

ऐ खुदा गर तू सब देखता है

Girish Mehra

12 कविताएं

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ऐ खुदा गर तु सब देखता है
तो देख कैसे
पाखंडी बाजार मे
आद्शो कि धुम मची है
अस्तिव परिचय है नही
संस्कारो कि लुट मची है

गली चौराहे व नगर नगर
बेमानी मक्कारी पसरी है
हर एक मै खौफ भरा तो
हर तरफ अफरा तफरी है

कही घनघोर बादल हताशा के
कही चीख पुकार से मातम पसरा है
कही बचपन अन्धियारे मे लिपटा तो
कही नन्ही सी एक कली को
पग पग पर
मुरझाने का खतरा है

गर तु सब देख रहा है
तो फिर तु क्यों मौन है
या तु है, ही, नही
या तु देख सकता ,, नही
या इन सब घिणीत अपराधो मै
तेरी, रज़ा मन्दी है

हे प्र्भु - सब मेरे वन्दे है
तु मालिक, तु दाता
तु श्रष्टि का रचेता है
धरम ग्ंथो मै तु कहता है

तेरी मर्जी के बिना
एक पत्ता नही हिल सकता है
गर तेरे वन्दे है सब
तो तेरा सरक्षण ज़रुरी है

देख अस्तित्व खतरे मे है तेरा
तु इस धरती पर लौट आ
कुछ दरिन्दे खुदा बन बैठे
तु इस से पहले जाग जा,, जाग जा,,

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