आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Mushafir hun

मेरे अल्फाज़

मुसाफिर हूँ

Ghanshyam Bairagi

154 कविताएं

22 Views
चलना तू जिंदगी
ये तेरा धरम है,
मुसाफिर
मैं सफर में ;
ये मेरा करम है.
फल की चिंता,
ना कभी मैने किया.
बस,
चलते रहना ;
ये है मेरा सिफा.
कभी शिकायत
किया भी मैने,
अपने आप में
जिया भी मैने.
आज अट्टहास
करता है दुनिया,
क्या खोया
क्या पाया ;
कहता है दुनिया.
जिंदगी में सबकुछ
मिलता है कहाँ,
जिंदगी सफर है
चलता है दुनिया.
बस,
इसी सफर में ;
हम भी तो हैं चलते.
चलते चले जाना है,
मुसाफिर है दुनिया ।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!