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मेरे अल्फाज़

दास्ताँ हर लम्हों की तसव्वुर में मिले.

GAYATRI THAKUR

26 कविताएं

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थे तसव्वुर में जो लम्हे,
वो लम्हे कभी के बीत गए.
कुछ को पा लिया हमने,
कुछ हाथों से छूट गए .
जो बांध रखे थे मुट्ठी में,
वह धीरे से रीत गए.
वक्त ने दिए जो लम्हे ,
वो रेत से फिसल गए.
वक्त से चुराकर कुछ लम्हे ,
तलाशा जो वक्त को हमने, लम्हे नहीं मिले.
दास्तां हर लम्हों की, बस तसव्वुर में मिले.

- गायत्री ठाकुर

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