अब और नहीं

                
                                                             
                            क्यों ढूंढते हो मंदिरों में राम,
                                                                     
                            
जब हृदय में तुम्हारे राम नहीं
दानवों के संसार में, मानवता का नामोनिशान नहीं
वहशी दरिंदों के कृत्यों से, क्या मनुजता शर्मसार नहीं 
अब बेटियां घर की बंदी नहीं,
क्यों हाथों में दुर्गा के कोई तलवार नहीं 
न्याय की देवी के आंखों में, अब काली पट्टी का श्रृंगार नहीं 
सिंह गर्जना होनी चाहिए मामूली फुफकार नहीं 
इंसानों की बस्ती में, पशुओं का अब वास नहीं 
बहुत हो चुका अब  और नहीं,
अब और नहीं 


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8 months ago
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