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मेरे अल्फाज़

जीवन एक अद्भुत यात्रा

Gautam Sharma

1 कविता

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आता है याद ओ बचपन अपना,
मां बाप और अपनों का प्यार और दुलार,
और फिर पढ़ाई का दौर,
जिसके बाद नौकरी की होड़।
इन सब के बीच था शैतानी का दौर,
याद आता है स्कूल से टिफिन में,
पास के किसी बगीचे में घुसना,
पेड़ों पे चढ़ना, आम अमरूद तोड़ना,
माली की आवाज़ सुन, पेड़ों से कूदना,
दौड़ना और भागना,
फिर तोड़े हुए फलों को आपस में बांटना,
क्लास में पढ़ते हुए, किसी साथी को छेड़ना,
स्कूल से छुट्टी के बाद, घर आना,
मां के हाथों से खाना खाना।
याद आता है , घर बाहर की शिकायतों पे,
पिताजी के हाथों मार खाना,
ये सब अब तो सिर्फ याद आते हैं,
क्योंकि अब कहां है वह बचपन,
अब तो सिर्फ याद कर , छटपटाना है।
फिर एक दौर आया पति बने, पिता बने,
भाग दौड़ की ज़िंदगी में ऊंचाईयां छुए।
फिर एक दिन रिटायर हो गए,
बेकार हो गए ,घर में बैठ गए,
बुजुर्ग हो गए और फिर बीते दिनों को,
याद कर कभी रोना है तो कभी मुस्कुराना है।
हम क्या थे और आज क्या हो गए।
यही तो शायद होता है, सभी के साथ।
इसी तरह जीवन यात्रा का समापन होना है,
और फिर एक दिन,
यादों की इन गठरियों को समेटे,
सब कुछ छोड़ और सभी को भुला,
महाप्रयाण को निकल जाना है।


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