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Mother

मेरे अल्फाज़

माँ

Gaurav Verma

3 कविताएं

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वह कौन है जिसकी आत्मा हमारी आत्मा से जुड़ी होती है
क्या कहा परमात्मा ? हाँ शायद, पर वह परमात्मा से भी बड़ी होती है

इस धरती पर तुम्हारे पहले कदम कि जिम्मेदार है वह
देखा जाये तो तुम्हारी हर ख़ुशी की हिस्सेदार है वह

तुम्हारे बचपन की यादों में उसकी एक बहुत बड़ी भूमिका थी
उस निश्च्छल बचपन में जिसने रंग भरे वह उसी की तूलिका थी

जो आँचल हमेशा तत्पर रहता था तुम्हें गोद में भर लेने को
आओ चलें उस प्रतिमा को कुछ तो याद कर लेने को

सारा जग परिवर्तनशील था पर वही पता नहीं क्यों अडिग थी
हमने भी अपने में खूब परिवर्तन देखे पर उसकी ममता एकदम सटीक थी

जब हम मज़बूर थे कुछ नहीं कर पाते थे
तब वही हाथ वही बाँहें हमें झूले झुलाते थे

नन्हें-नन्हें पैरों से इस धरती को नापते थे
किसी भी चीज़ को देखकर डरकर कांपते थे

उन चीज़ों से पहला परिचय कराया था उसने
क्या प्रेम का भाव जताया था ? शुक्रिया अदा किया था तुमने ?

कैसे करते अक्षरों का ज्ञान भी तो उसी को कराना था
हमारे मुख से अपने को माँ कहलवाना उसी को सीखना था


धीरे-धीरे जवानी आयी, बहारें लायी, हर तरफ खुशियों की लड़ी थी
गौर से देखा तो वह फिर हमारे साथ ही खड़ी थी

अच्छे व बुरे में भेद का पाठ पढ़ाया था उसने
हमारे चरित्र की नींव में एक पत्थर लगाया था उसने

अब ना तो वो बचपन रहा, न वो जवानी की बारात है
पर मातृत्व का वो एहसास अभी भी हमारे साथ है

एक दिन उसे देखा तो उसके चेहरे पर एक शिकन थी
बूढ़ी हो चुकी थी वह बुढ़ापे की वो सिहरन थी

हाथ कांपते थे उसके जब वह हमें आशीर्वाद देती थी
अपने पैरों से भी छोटे-छोटे कदम भर्ती थी

आज एक दुआ करते हैं हम की उसका मातृत्व कभी ख़तम न हो
इस दुनिया में किसी की भी माँ की महत्ता कभी काम न हो

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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