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मेरे अल्फाज़

उम्मीद

Gaurav Rekha

1 कविता

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हमारे शौक के आंसू
किसी को दिख गए होते
तो हम भी अपने अफ़साने
कहीं पर रख गए होते

वो कागज़ मिल नहीं पाया
वो स्याही बन नहीं पायी
जिससे उस कहानी को
हम कहीं लिख गये होते

कोई बोली लगाने को
खड़ा हो ही नहीं पाया
अगर लगती सही कीमत
तो हम भी बिक गये होते

नज़र कमजोर रखते हो
या फिर चश्मा नहीं पहना
नज़र में जोर जो होता
तो हम भी दिख गये होते

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