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मेरे अल्फाज़

सितम ढहाने को जी चाहता है

GAURAV LALWANI

11 कविताएं

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वक़्त का मंजर बहते बहते किस लम्हें थम सा जाये,
हर शख्स का एक वक़्त होता है, वह हमारा वक़्त नहीं था,
पर इसका ये मतलब नहीं की वो वक़्त, वक़्त नहीं था...
ए जिंदगी तू साथ होकर भी साथ नहीं होती,
अब तो राहत में भी राहत नहीं होती,
हम सैकड़ों जन्म लेते हैं, कभी पती पत्नी बनकर,
कभी प्रेमी बनकर, तो कभी अनजाने बनकर,
लेकिन मिलते जरूर है आखिर में,
नहीं मिले तो कहानी खत्म कैसे होगी,
इसे जिंदगानी कहते है
नवाजिश, कर्म, शुक्रिया, मेहरबानी......
मुझे बक्श दिया आपने जिंदगानी,
दुनिया का सितम याद, ना अपनी ही वफ़ा याद......
अब कुछ भी नहीं मुझको मोहब्बत के सिवाह याद,
बेखबर सोये है वो लूट के नींद मेरी,
जज्बा-ए -दिल पे तरस खाने को जी चाहता है.......
कब से खामोश हुए हो जाने जहान कुछ बोलो....
क्या अभी और भी सितम ढहाने को जी चाहता है...

गौरव ललवानी


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