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मेरे अल्फाज़

मेज़ पर पड़ी कलम

Garima Mishra

4 कविताएं

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मेज़ पर पड़ी कलम पुकारती है तुझे,
खींचती है तुझे भावों की डोरी से..

सुनाती है कभी आधी, कभी पूरी कहानी,
तेरे लफ़्ज़ों को गाती है अपनी ज़ुबानी..

मेज़ पर पड़ी कलम पुकारती है तुझे…

कहती है..तुम मेरे पैर बनो, मैं तुम्हारे हाथ..
कभी तुम दो मुझे सहारा, कभी मैं दूँ तुम्हारा साथ..
गर शब्दों के बीच उलझोगे तो सुलझा लूंगी मैं,
पर जज़्बातों में बहोगे तो बहने दूँगी मैं…

मेज़ पर पड़ी कलम पुकारती है तुझे…

स्याही-स्याही पिरोती है शब्दों की माला,
तेरे मन की चिंगारी को बनाती है ज्वाला..
है चाक़ू सी तेज़ी और तलवारों सी धार,
साधारण डील-डौल, पर असाधारण वार

मुश्किल है ये कहना कि कौन किसका साथी है..
कलम ही तेरा अर्जुन, तेरा कृष्ण, तेरा सारथी है..

मेज़ पर पड़ी कलम पुकारती है तुझे…





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