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मेरे अल्फाज़

बेक़रार हम

Garima Mishra

14 कविताएं

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*बेक़रार हम*

बेक़रार हम बेकरार तुम
है पता नही हुए कहा पे गुम

ख्वाब मेरा जहां हो वहां पे तुम
दिन की रौशनी रात का सुकूं
दिल की धड़कनों के साज हुए हो तुम

बेक़रार हम बेकरार तुम
है पता नही हुए कहां पे गुम

दिल की राह में साथ हम चले
क्या पता तुम्हें किस तरह मिले
रात में मेरे ख्वाब हुए हो तुम

बेक़रार हम बेकरार तुम
है पता नही हुए कहा पे गुम

ख्वाब की कोई सीमा अब नही
जो हुए हो तुम जिंदगी मेरी
सास अब तुम्ही साज अब तुम्ही
सपने बुन रहे बेपनाह से हम

बेक़रार हम बेकरार तुम
है पता नही हुए कहा पे गुम

 - गरिमा मिश्रा

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