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मेरे अल्फाज़

अब हम बड़े हो गए हैं

Gagan Kamat

9 कविताएं

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अब हम बड़े हो गए हैं,
अपने पैरो पर खड़े हो गए हैं।
कभी ख्वाईश थी चन्द पैसों से बटुए सजाने की,
अब बिल्कुल ही हरे हो गए हैं।
कल तक जितनी चाहतें थी,
वो सब आज मिली है,
क्या खूब सौदा किया है, जिन्दगी ने,
बदले में सारी खुशी ले ली है।
पहले तो पापा से डाँट प़ड़ती थी,
तो माँ आती थी मनाने को,
अब साहब से डाँट पड़ती है तो,
हंसी आती है जमाने को।
कितनी पटती थी अपनी भी दोस्तों से कभी,
एक साईकिल पर तीन-2 बैठ,
भटकते थे हम सभी।
अब तो चार पहिए पर भी,
मित्र अकेला बैठता है,
तन्हा हमें बस टॉप पर पाकर भी,
निष्प्रभ गुजरते देखता है।
कितने तन्हाई से जड़े हो गए है,
जबसे इतने बड़े हो गए है।
रुपये के दो कुल्फी वालो के पीछे दौड़कर,
मिलती थी जो खुशी,
सितारे होटलों में कॉफी विद आईस पीकर
वो खुशी मिलती ही नही।
कभी चन्द सिक्कों को झनझनाकर,
हमें ज्यादा का अहसास कराना आता था,
कागज की कस्तियों में, विमानों में,
चंचल मन को सैर कराना आता था।
अब इन खुशियों से परे हो गए है,
जैसे-जैसे बड़े हो गए है।

बचपने के उन हरकतों को हमनें,
फिर से मर्तबों दोहराया है,
पर ना वो खुशी, ना वो जूनूं,
ना वैसा नशा कभी छाया है।
क्यूँ हम इतने बडे़ हो गए हैं।।



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