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मेरे अल्फाज़

यकीं नहीं होता

Feeroz Hasan

17 कविताएं

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“सुलगना छोड़ दे सहरा, यकीं नहीं होता,
मेरे दिमाग़ पे पहरा, यकीं नहीं होता,
“वही जो मुझको महकते गुलाब देता था,
उसी के साथ है खंजर, यकीं नहीं होता,
“हमीं ने मैली सियासत का बीज बोया है,
हमीं दिखाएँ गिरेबां, यकीं नहीं होता,
“ये जितने अहल-ए-सियासत हैं, इनकी रोज़ी है,
उन्हीं से फूल की ख़्वाहिश, यकीं नहीं होता,

“तमाम घर में अँधेरों की बख्शिशें दे वो,
कहे चिराग़ जलाओ, यकीं नहीं होता,
“क़लम को छोड़ कर हमे बहुत तरक़्क़ी की,
अज़ीज़ बम हैं हमारे, यकीं नहीं होता,
“वो मेरा दोस्त मेरे नाम से भी जलता है,
कभी क़रीब था इतना, यकीं नहीं होता,
“हमें उम्मीद है वो दौर फिर से आएगा,
यही निज़ाम चलेगा, यकीं नहीं होता”


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