आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Ghazal

मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल

Fareed Qamar

2 कविताएं

15 Views
हरा था ज़ख़्म जो बरसों से, भरने वाला है
तुम्हारी याद का मौसम गुज़रने वाला है

मुझे पता है कि नफ़रत बुझा हर इक ख़ंजर
मेरे ही सीने में इक दिन उतरने वाला है

तवील शब् है मगर फिर भी हौसला रक्खो
यहीं से इक नया सूरज उभरने वाला है

तमाम शह्र का फैला हुआ ये सन्नाटा
मेरे वजूद में जैसे उतरने वाला है

वो दूर उफ़क़ में थका सा लहू लहू सूरज
बड़े सुकून से कुछ पल में मरने वाला है

महक रही है गुलाबों से दिल की ये वादी
इधर से हो के वो शायद गुज़रने वाला है

- फ़रीद क़मर

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!