तुम रूठ केे क्या गये हमसे सावन भी रूठ गया........ !

                
                                                             
                            तुम रूठ केे क्या गये हमसे
                                                                     
                            
सावन भी रूठ गया
रह गई हैं सारी बातें
हर सपना टूट गया.


नहीं कोई किरण अब दिखती
घनघोर घटा जब घिरती
तन मन झुलसा जाता
बादल भी भय दिखलाता
टप – टप गिरता मोती
हाथों से छूट गया.
तुम रूठ केे क्या गये हमसे
सावन भी रूठ गया........ !


घर बाहर गलियारा
तुम बिन छत चौबारा
सब लगता है बेगाना
घर अपना ही वीराना
झर – झर गिरता आंसू
गालों पर सूख गया.
तुम रूठ केे क्या गये हमसे
सावन भी रूठ गया........ !


तुम्हें याद नहीं क्या वो दिन
जब बिजली चमक गई थी
दौड़ कर जब मैं घर से
तुमसे लिपट गई थी
सर – सर गिरता पानी
तन - मन डूब गया.
तुम रूठ केे क्या गये हमसे
सावन भी रूठ गया
रह गई हैं सारी बातें
हर सपना टूट गया.


तुम रूठ केे क्या गये हमसे
सावन भी रूठ गया........ !


- एकता बृजेश गिरि

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 years ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
X