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मेरे अल्फाज़

जब घर कीचड़ में था

Durgesh Kulshrestha

12 कविताएं

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जब घर कीचड़ में था उनमें नित कमल खिला करते थे I
रोज शाम को चौपालों पर खिलखिला कर मिला करते थे |
होती थी चर्चाएं ज्ञान की,जहां परमपरा और सिद्धांतों की बातें थी |
वहीं एक तरफ दादा दादी चाचा चाची का अतुल्य प्यार था |
कहानियां थी हाथी घोड़ों, राजा रानी ऋषियो और भगवान की|
राम और कृष्ण का सा चरित्र मानस मैं, बातें वीर बाल बालिकाओं की थी|
बड़े-बड़े वैज्ञानिक बड़े-2 वीर बहादुर दिए हैं इन कीचड़ की खानो`ने|
जो घर की चुनौती से पल पल लड़ा करते थे और सुसज्जित भी रहते थे |
सुगढ़ सुव्यवस्थित भी रहते थे क्योंकि अवस्था कीचड़ की थी |...
अब घर सुंदर नगरों महलोंं सा है अब हर जगह कीचड़ मिला करती है
सुख सुविधाओं का समान सुसज्जित है सुव्यवस्था और सरलता नहीं है
परंपराएं ना सिद्धांत है मनुष्य पड़ा ऐसे गर्क में यह कैसा संभ्रांत है
न शांति मन में नग्न है सत्कार,जीवन में शिक्षित होकर भी अज्ञान है |
लुप्त हुए हैं आचार-विचार, आत्मीयता प्रेम सहिष्णुताऔर सहकार |
यह कैसा सभ्य समाज बनाया है ज्ञान विद्या और नैतिकता ठुकराया है
ब्रह्म ज्ञानी बहुत है न अंतर में कोई ज्ञान शिक्षित होकर भी है सब अज्ञान|


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