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मेरे अल्फाज़

"धर्म और ज्ञान" बह रहा दुग्ध अवस्था में

Durgesh Kulshrestha

12 कविताएं

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"धर्म और ज्ञान" बह रहा दुग्ध अवस्था में,"पान इसे कर "आत्ममंथन" लाने को नवनीत अवस्था में ||

प्रेम आत्मीयता,सहकार और सहिष्णुता की अग्नि से इसको तपा,"लाने को घृतअवस्था में ||

होगा,"स्वस्थ और पुष्ट समाज का निर्माण" एक दूसरे के लिए स्वीकार्य भाव चरितार्थ लाने से ||

बनेगा सदव्यवहार मंडल,"ओतप्रोत आत्मीयता व सद्भावो से,इस घृतनिर्मित मधुर पकवान खाने से||

मिट जाएंगी सब बीमारी,"मानसिक उद्वेग,तृष्णा व एकाकीपन," एक दूसरे को करीब लाने से"||

बंट जाएंगी सब तकलीफें,"परस्पर सम्मान देने से" वसुधैवकुटुंबकम का सार्थक भाव लाने से ||

"मैं जो एक आत्मा हूं,"वह जो एक परमात्मा है" उसकी सेवा मैं कैसे करूं ऐसा मानस बनाने से ||

"राष्ट्र"होगा सशक्तसूडॉल सर्वोत्तम होगी आर्थिकता नैतिकता होगी विचारों में सब को साथ लेने से ||

"धर्म और ज्ञान" बह रहा दुग्धव्यवस्था में,"पान इसे कर आत्ममंथन लाने को नवनीत अवस्था में ||

दुर्गेश कुमार कुलश्रेष्ठ


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