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मेरे अल्फाज़

कृष्ण जन्माष्टमी...

Dr.bhim Singh

38 कविताएं

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हिल गयी धरती अम्बर हिल गया
हिल गया ये जग सारा
अत्याचार का कसा शिकंजा
कंस बना हत्यारा
काल कोठरी जेल में डाला
छाया घन अंधियारा
घोर तिमिर अब रहता ऐसा
शून्य हुआ जग सारा

देवक और बसुदेव का जीवन
घोर यातना पाये
तिमिर घना है इतना मानो
शून्य सभी दिखलाये
स्पर्श बोध और ध्वनि प्रभाव से
एक दूजे को पायें
भूख प्यास की व्यथित वेदना
आर्त नाद चिल्लाये

शून्य भेद कर आगे देवक
प्रभु शरण में आये
हृदय बना मंदिर को उसमें
ईश्वर को बैठायें
अश्रु धार से दोनों प्राणी
नित स्नान करायें
असह्य वेदना भूख की सह कर
प्रेम का भोग लगायें

समय काल सब बीता जाता
कंस काल बन आता
छीन बहन के पुत्रों को
वो पटक मार चिल्लता
हिंसक बन वह मौत खेलता
जरा नहीं शर्माता
कराह उठा है हृदय देवकी
सुन वैकुण्ठ लजाता
देख दशा इस भक्त युगल का
प्रेम अश्रु बह जाता

द्रवित हॄदय हो गया प्रभु का
विकल हो शंख बजाये
अनंत ब्रह्म आदेशित कर के
ब्रज मंडल में आये---

रचनाकार डॉ भीम सिंह " चौतरवा "


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