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मेरे अल्फाज़

काल कोठरी कंस की ऐसी

Dr.bhim Singh

38 कविताएं

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काल कोठरी कंस की ऐसी
भानु रश्मि नहि दिखती है
शशि दिवाकर आएं जाएं
देवकी नहीं समझती है
कसी हथकड़ी पड़ी भूमि पर
अश्रु धार नहि रुकती है
बालक सात हतें हैं सन्मुख
आठवें की मृत्यु खटकती है

प्रहर घड़ी वो बेला आयी
पहरे को सख़्त वो करते हैं
द्रवित ब्रह्म बैकुंठ छोड़कर
तनय देवकी बनते हैं
प्रेरित हो बसुदेव चले
और पुत्र सूप में रखते हैं
बाहर आये तो देखा
भादो घन तिमिर बरसते हैं

पिता प्रेम के पौरुष को
बाधा कोई रोक न पाया है
उदगार हृदय प्रेम का उठ कर
अखिल विश्व में छाया है
देख प्रेम का चरम तेज
हर बाधा शीश नवाया है
जमुना छोटी पड़ गयी आज
घन बरस मेघ शर्माया है

बालक रखा नंद के आंगन
बसुदेव चले कन्या लेकर
अभय किया अभय कारक को
पिता प्रेम उसको देकर
लौटे कारागार में आये
जगा दिया देवक रोकर
दंग किया कंस को ऐसा
हन्ता जन्म लिया कह कर

----डॉ भीम सिंह " चौतरवा "


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