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मेरे अल्फाज़

प्रकृति को सजा

dr vandna sharma

96 कविताएं

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अचानक से आये एक वायुयान ने
माचा दी हलचल आकाश में
इधर -उधर उड़ने लगे
बैचेन हो परिंदे
खो अपनी स्वभाभिक चाल
हो गए अपने समहू से दूर
हे निष्ठुर मानव
क्या ज़मीन कम लगी तुझे
धरती पे क्या कम था तेरा आतंक
कि कर दी दखल
तूने परिंदो के जहाँ में
कम से कम इस जहाँ को तो बक्शा होता
निसंदेह मानव ने प्रगति का इतिहास रचा है
पर किस कीमत पर ?
कभी क्यों नहीं सोचा
प्रकृति से पन्गा ना ले मानव
क्रोध इसका पचा नहीं पायेगा
अब भी वक़्त है ,संभल जा
धरती को बचा ,प्रकृति को सजा ----

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