विज्ञापन

ख़ुशी की तलाश

                
                                                                                 
                            ख़ुशी की तलाश में हम दूर तक गए
                                                                                                

इधर न मिली ,उधर ना मिली
यहाँ ना मिली ,वहां ना मिली
मिली तो मेरे मन में मिली
बैठी थी एक कोने में
लगी थी रोने -धोने में
मैंने पूछा -ये क्या बात हुई ?
नाम तो ख़ुशी और खोयी हो झमेलों में
उसने कहा -
तुम्हारी उदासी मुझे
नहीं आने देती बाहर
तुम मुस्कराऊं तो मैं आती हूँ बाहर
जिसे तुमने ढूंढा जग में
मिलेगी तुम्हें अपनी हंसी में
मेरे हँसते ही फ़ैल गयी ख़ुशी चहुँ ओर
और बिखेर दिए इंद्रधनुषी रंग ज़िंदगी में
अब मुझे हर पत्ता हँसता लगता है
कबूतर का फुदकना, चिड़िया का चहकना
पेड़ों का हिलना, सबमें संगीत बजता है
बादलों से बनती बिगड़ती आकृति
कितनी सुंदर है ये प्रकृति
बारिश की बूंदों में जीवन समाया लगता है
ख़ुशी ही ख़ुशी, मन की ख़ुशी
मुझमें ही मिली

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
3 years ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X