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मेरे अल्फाज़

वैमनस्यता

Diwakar Ojha

125 कविताएं

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मत जलाओ देश को प्यारे
तेरा घर जल जायेगा।
रोयेगा फिर आंसू भर भर
जीवन भर पछतायेगा।।

साथ ना देगा कोई तुझको
अर्थी खुद उठायेगा।
जिसके शह पर बढ़े चले हो
पीछे वो मुड़ जायेगा।।

हरा भरा गुलशन है सारा
अपनी मन-मर्यादा है।
हाथ तिरंगा दिल में गंगा
जन-गण-मन मुख वादा है।।

दिन में पहरा था सूरज का
रात अकेली हो गयी।
नभ में हैं ये चांद सितारे
फिर क्यूं दूरी हो गयी।।

हम श्रद्धा के फूल चमन में
बरवस खिलते देखे हैं।
बिन पर के ऐसे मानुष को
नभ में उड़ते देखे हैं।।

मेरे घर में बैठ मुसाफ़िर
हमको ही धमकाता है।
तेरा मेरा रिश्ता क्या है
कह के यह समझाता है।।

तुम देश जलाने को हो तत्पर
हम आग बुझाने बैठे हैं।
तुमने गड्ढा खोद दिया
हम उसे पाटने बैठे हैं।।

अब नहीं संभव है ऐसा
गुलशन गलियां छोड़ चलो।
मेरे घर तू मौज मनाते
अब मेहमानी तोल चलो।।

वही है धरती वह है अम्बर
जिस पर तू सुख पायेगा।
मत जलाओ देश को प्यारे
तेरा घर जल जायेगा।।

*दिवाकर ओझा"विधुबिहारी"


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