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मेरे अल्फाज़

तुम भागकर कहाँ जाओगे!

Diwakar Ojha

112 कविताएं

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जिन्दगी के जाल को नहीं भेद पाओगे।
आखिर तुम भागकर कहाँ जाओगे।।

सुख-दुख, खुशी और गम
के ताने-बाने से बने हैं ये,
जीवन भर इससे खेल पाओगे!

अगर जीत हुई
तो श्रृष्टि को साकार कर पाओगे
अगर हार हुई
तो निराश हो जाओगे।
मंजिल कहीं
तुम कहीं
दूरियां अंधकार में नजर आओगे।
तुम भागकर कहां जाओगे।।

भागते-भागते तो थक गये सितारे भी
मंजिल तो एक है
राहें अनेक
अगर तुम
इस श्रृष्टि को समझ पाओगे।

छोटी-सी जिन्दगी
और अहंकार इतना बड़ा
साध पाओगे
या राहें भूल जाओगे।

विरह-मिलन इसके
दो आशियानें हैं
किसी में अंधकार
तो किसी में प्रकाश
निराश नहीं करते ये किसी को
जब इसकी हकीकत जान पाओगे।
तुम भागकर कहाँ जाओगे ।।

-दिवाकर ओझा "विधुबिहारी"

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