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मेरे अल्फाज़

प्यारा बचपन...

Divya Sharma

21 कविताएं

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थाम कर उंगली माता पिता की
चलना वो सीखता है
दादी नानी के किस्से सुनके
रात में वो सोता है
हां बचपन कितना प्यारा होता है..

बन जाता है वैसे ही
जैसे सांचे ढलता है
सच को वो सहज ही
बिना भय के बोलता है
हां बचपन कितना प्यारा होता है..

गुड्डे गुडिया की शादी करके
दावत वो देता है
कागज की नाव बनाकर
वो बारिश के पानी में बहाता है..
हां बचपन कितना प्यारा होता है..

घर के आंगन में वो
फूल बनके महकता है
तोतली बोली से अपनी
रस कानों में वो घोलता है
हां बचपन कितना प्यारा होता है..

काश लौट के आ सकता वो बचपन
जो पीछे छूट गया है
अब तो बस यही सोचती हूं
बचपन कितना प्यारा होता है...

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