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मेरे अल्फाज़

ये सर-जमीं हम सबकी है

Dishant Srivastava

5 कविताएं

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फिर लिखूं कोई शेर मैं या लिख दूं लाखों सिसकियाँ
गुलशन को लफ़्ज़ों में बुनू या लिख दूँ उजड़ी बस्तियां

इंसान अब है ही कहाँ कैसे लिखूं इंसानियत
नफरत के दरिया में टिकी हैं बेबसी की कश्तियाँ

आवाम कुछ सहमी हुई बदली सी है ये सियासत
इतने दरिन्दे हैं यहाँ किस किस से होगी बगावत

ना-पाक हर मंसूबा है गुलशन भी है कुछ शर्मसार
घर फूंक कर अब सिक रही है दुश्मनी की रोटियां

कोई बताये इनको भी क्यूँ लड़ रहे हैं हम यहाँ
सब उसके ही तो बन्दे हैं और उसका है सारा जहा

कोई धर्म हो कोई नाम हो हर जीस्त बे-नज़ीर हैँ
ये सर-जमीं हम सबकी है हर शक्श है अपना यहाँ
©दिशान्त
#Dishantapoetinside
Facebook.com/dishantapoetinside




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