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मेरे अल्फाज़

जब आज बनी मैं एक माँ।

Disha Gaur

5 कविताएं

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जब आज बनी मैं भी एक माँ तो दर्द तेरा जाना मैंने।
किये थे कितने जतन तूने की मैं इस दुनिया को देख सकूँ।
तेरी ऊँगली को थाम के माँ मैं हर बाधा को भेद सकूँ।
करती होगी अनवरत प्रयास माँ शब्द ज़रा सा सुनने को।
रोती होगी गिरने पर मेरे नन्हें क़दमों को चुनने को।
हृदय से लगाये रखती होगी कि खो न कहीं भी जाऊँ मैं।
तेरे आँचल में छुपके ही सौभाग्य जहाँ का पाऊँ मैं।
जब आज मेरा नौनिहाल मुझे माँ-माँ कहके बुलाता है।
न जाने क्यूँ हर बार मुझे बस तेरा ही स्मरण आता है।
अपने जीवन की आहुति से माँ तूने हमे संवारा है।
अपने अंधकारों से लड़ उजाला तूने फैलाया है।
उऋण नहीं हो सकते हम अगर पुनर्जन्म भी लिया हमने।
जब आज बानी मै भी एक माँ तो दर्द तेरा जाना मैंने।

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