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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल

Dinesh Vishwakarma

1 कविता

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ग़ज़ल
(2122/212/2122/212)

ज़िन्दगी में मिलती हैं,
ज़िंदगी की मुश्किलें
कितनी मिलती-जुलती हैं,
हर किसी की मुश्किलें।

है ज़रूरी इन दिनों,
क़ायदे सीखो नये
ले न डूबे आपको,
सादगी की मुश्किलें।

फूल, तितली, चाँद से
ले ही लो तुम मशविरा,
आदमी से हल न हों
आदमी की मुश्किलें

कुछ परिंदे छत पे आते हैं
पानी के लिए,
कम न दरिया से हुई
तिश्नगी की मुश्किलें।

धूप, दरिया, फूल, जुगनू
हर इक शै में है तू,
है बहुत आसान ये
आशिक़ी की मुश्किलें

दिनेश कुमार विश्वकर्मा


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