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मेरे अल्फाज़

यूं भी अपनों को आजमाया कर

Dinesh Pratap

32 कविताएं

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यूं भी अपनों को आजमाया कर
झूठ को सच ही मान जाया कर

सदावरकी भी इतनी ठीक नहीं
कुछ दिनों को तू रूठ जाया कर

ज़िंदा रहने का तू कुछ तो सुबूत दे
कटे सर फिर भी तू उठाया कर

मौत तो सिर्फ सूद है इसका
ज़िन्दगी का कर्ज चुकाया कर

लुत्फ़ है इसमें ज़िंदगानी का
रूठ ले, फिर तू मान जाया कर

छेड़छाड़ सच में चल नहीं सकती
झूठ को घटा या बढ़ाया कर

- दिनेश प्रताप सिंह चौहान

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