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मेरे अल्फाज़

ये जो शहर भर में अँधेरा तमाम है

Dinesh Gupta

39 कविताएं

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ये जो शहर भर में अँधेरा तमाम है
चराग तो बरी है, जुगनुओं पर इल्ज़ाम है

रौशनी कैसे पहुँचेगी आपकी दहलीज़ तक
उनके आँगन में कैद जो सुबहो-शाम है

हर रोज ही कोई घर जलता है इस शहर में
अखबार की सुर्ख़ियों में तो ये खबर आम है

आप बेवफा हैं पर बेक़सूर हैं
इश्क में हमारे ही सर सब इल्ज़ाम है

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