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आँखें मां बाप की पत्थर बन

                
                                                                                 
                            जिंदगी प्रतिदिन और उलझती जा रही,
                                                                                                

जरूरतें इंसान को भी पीसती जा रही ।
मंहगाई आग की तरह हर रोज बढ़ रही
बुझाने की कोई तरकीब नहीं आ रही ।
इश्क मोहब्बत और हुश्न की सारी बातें
किताबों से,हकीकत में कहाँ आ रही ।
जवानी इंतजार और तैयारी में गुजरती
नौकरी हर एक के हिस्से नहीं आ रही।
आँखें मां बाप की अब पत्थर होकर
औलाद की बेवशी पर बस ताक रहीं।

- दिनेश चौहान
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2 months ago

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